कूटियाट्टम केंद्र: एक परिचय

कूटियाट्टम एक सबसे पुराना नाट्य रूप है, जो आज भी अस्तित्व में है और आज यदि यह प्राचीनतम नाट्य रूप विद्यमान है तो इसके लिए हमें केरल के चकियार और नाम्बियार समुदाय का आभारी होना चाहिए। चकियार और नाम्बियार मंदिर सेवा से जुड़े समुदाय हैं, जिन्हें मंदिरों से सरंक्षण मिला और जिन्होंने कूटियाट्टम जैसे प्राचीनतम नाट्य रूप को सरंक्षित रखा। शब्द 'कूटियाट्टम' का अर्थ है : एक साथ अभिनय। इस नाट्य में एक ही समय में मंच पर दो या दो से अधिक कलाकार अभिनय करते हैं। पांच दशक पहले तक, कूटियाट्टम नाट्य की प्रस्तुति केवल चकियार और नाम्बियार ही कर सकते थे। ताल बरक़रार रखते हुए नाम्बियार ढोल के माध्यम से चकियार को अभिनय में मदद करते थे। कूटियाट्टम में पुरुष पात्रों का अभिनय चकियार अभिनेता करते हैं जबकि स्त्री पात्रों का अभिनय नाम्बियार परिवार की स्त्रियाँ करती हैं। इस प्राचीन नाट्य रूप का आस्वाद प्राप्त करने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान आवश्यक है, जिसमें केरल की सुदृढ़ और विशिष्ट स्थानीय उच्चारण और बोलियों का रस भी मिला हुआ है। कूटियाट्टम वस्तुतः संस्कृत शास्त्रवाद और केरल की स्थानीय परम्पराओं के एक अनूठे संश्लेषण का प्रतिनिधित्व करता है। जहाँ एक ओर भारत के अन्य हिस्सों में संस्कृत नाटकों के प्रदर्शन की परम्परा का अस्तित्व अब समाप्त हो गया है, वहीँ केरल में संस्कृत नाट्य प्रदर्शन की यह परम्परा निरंतर और अटूट बनी रही है, जिसे केरल के कुछ मंदिरों ने जीवंत और अटूट बनाए रखा, मंदिरों से जुड़े इस रंगमंच को कुट्टाम्बलम के रूप में जाना जाता है।

संस्कृत रंगमंच की इस निस्तेज होती जा रही परम्परा के चिन्हों को बचाने - बढ़ाने और इसकी स्थानीय परम्परागत भाषा और भाव विन्यास को संरक्षित करने के उद्देश्य से संगीत नाटक अकादेमी, जो कि संगीत, नृत्य और नाटक की राष्ट्रीय अकादेमी है, ने वर्ष 1990 -91 में कूटियाट्टम परियोजना का शुभारम्भ किया था। कूटियाट्टम के संरक्षण की दिशा में संगीत नाटक अकादेमी द्वारा समय- समय पर हस्तक्षेप के कारण न केवल इस प्राचीन कला रूप को पुनर्जीवन मिला बल्कि इससे जुड़े कलाकारों में भी उत्साह का संचार हुआ। वर्ष 2001 में, यूनेस्को ने कूटियाट्टम को मौखिक नाट्यकृति और मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में घोषित किया। यूनेस्को द्वारा कूटियाट्टम को मिली उक्त मान्यता का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि यह यूनेस्को के इतिहास में पहली बार था जब उसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से ऐसे कलारूपों का चयन किया था और उसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में वैश्विक स्तर पर लोगों ने जाना था।

उपर्युक्त आलोक में, अकादेमी ने कूटियाट्टम के संरक्षण और विकास के लिए अपनी परियोजना को एक तार्किक विकास का रूप देने के लिए कूटियाट्टम केंद्र की स्थापना की और मौजूदा परियोजना को भी उन्नत किया। वर्ष 2007 में अस्तित्व में आया कूटियाट्टम केंद्र केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित है।

 

आदेश पत्र
शास्त्रीय संस्कृत रंगमंच का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 'कूटियाट्टम के लिए केन्द्र' के रूप में कूटियाट्टम केन्द्र की स्थापना की गई है और इसके लिए निम्न दायित्व निर्धारित किये गए हैं:
केरल में कूटियाट्टम के प्रशिक्षण, नाट्य प्रस्तुतियों के निर्माण, संरक्षण - संवर्धन और प्रदर्शन से जुड़े सभी गुरुकुलम एवं प्रशिक्षण संस्थानों का वित्तीय पोषण।
कूटियाट्टम के क्षेत्र में प्रलेखन, सहयोग, अनुसंधान और प्रकाशन। केरल में और केरल के बाहर कूटियाट्टम प्रस्तुतियों का प्रायोजन।
सांस्कृतिक संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, शैक्षिक संस्थानों, मंदिर न्यासों तथा पूरे केरल में निवासी संघों के सहयोग से मासिक कूटियाट्टम प्रदर्शन का आयोजन।
कूटियाट्टम महोत्सव (वार्षिकोत्सव), सेमिनार, व्याख्यान एवं प्रदर्शन और कूटियाट्टम कार्यशालाओं का आयोजन।
एक कूटियाट्टम परिसर की स्थापना जिसमें कुट्टाम्बलम, पुस्तकालय, अभिलेखागार तथा संग्रहालय के लिए स्थान की व्यवस्था हो।

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें। http://kutiyattam.org/