Sangeet Kaladhara : Dahyalal Shivaram ( trans. Anil Behari Beohar Chetana J. Beohar Prem Lata Sharma

श्री सङ्गीत कलाधर रचयिता : डाह्यालाल शिवराम; अनुवादक : अनिल बिहारी ब्योहार, चेतना ज्योतिषी ब्योहार; सम्पादिका : प्रेमलता शर्मा 'सङ्रगीत कलाधर ' मूल गुजराती से हिन्दी में अनूदित रूप से प्रस्तुत किया गया है| भावनगर (गुजरात) के विचक्षण राजनायक विद्वान डाह्यालाल शिवराम के द्वारा सन् 1885-1900 में लिखा गया, 1901 में प्रकाशित यह ग्रन्थराज (लेखक के अनुसार) उन पाठकों एवं संगीत-कलाधर्मियों (गायक, वादक, नर्त्तक, विवेचक, संशोधक, सारग्राही, सहृदय रसिक आदि) के लिए बना था, जो प्राचीन शैली का अनुसरण करते हुए नवीन चिन्तन व प्रक्रिया को भी समझना चाहते हैं| अत: इस में परम्परागत संगीतशास्त्र के प्रमुख विषयों को आधुनिक विचारसरणी के योगसहित प्रस्तुत करने का सक्षम यत्न हुआ है, जैसे कि (1) ध्वनि की उत्पत्ति, प्रवहण, ग्रहण, तरड़ग, तारता-तीव्रता-गुण आदि का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण; (2) पाश्चात्य सड़गीत के स्टाफ नोटेशन का सुबोध परिचय एवं भारतीय सड़गीतलिपि का विन्यास; (3) मानव-शरीर के ध्वनि- उत्पादक यन्त्र् कण्ठ एवं श्रवणेन्दि्रय का वैज्ञानिक निरूपण एवं पाश्चात्य वर्गीकरण; (4) भारत के प्रमुख वाग्गेयकारों तथा पाश्चात्य संड़गीतकारों के उल्लेख; (5) प्रागैतिहासिक युग में सड़गीत युग में संगीत की उच्च-विकसित अवस्था; (6) वाक्र के चारों स्तरों का संक्षिप्त परिचय; (7) संगीत-योग; (8) संगीत के अड़ग; (9) गीत-वाद्य नृत्य का सम्बन्ध; (10) शास्त्रीय संगीत के विकास, प्रचार व प्रतिष्ठा में नाटय का मौलिक योगदान; (11) भारतीय, मुस्लिम तथा पाश्चात्य संगीत-पद्घतियों में समन्वय; (12) प्राचीन गीतों के अभ्यास का महत्व - इत्यादि| ग्रन्थ के नाम संगीत ' कलाधर' (चन्द्रमा) के अनुसार यहाँ सोलह कलाओं (प्रकरणों) में विषयवस्तु का प्रतिपादन है, जो सम्पादिका के भूमिकात्मक लेख 'ग्रन्थपरिचय' में विशद रूप से वर्णित है | कुल मिला कर इस अदभुत ग्रन्थराज का यह हिन्दी-रूप सभी गुणग्राही पाठकों एवं शोधकर्ताओं के लिए अतिशय उपादेय है| (सम्पादकीय भूमिका से उद्घृत) साईज 220 x 310 मी.मी.ए मूल्य 1250 रु¬ प्रथम संस्करण 2006