परिचय

संगीत नाटक अकादेमी भारत गणराज्य द्वारा स्थापित, नृत्य और नाटक की प्रथम राष्ट्रीय अकादेमी है।  इसका गठन भारत सरकार के तत्कालीन शिक्षा मंत्रालय के 31 मई 1952 के प्रस्ताव के जरिये किया गया था और भारत के गज़ट में इसे जून 1952 में अधिसूचित किया गया था। इसके पहले अध्यक्ष डॉ. पी. वी. राजमन्नार की नियुक्ति और देश भर के प्रतिनिधियों से बनी महापरिषद के गठन के बाद अकादेमी ने अगले साल काम करना शुरू किया। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 28 जनवरी, 1953 को संसद भवन में आयोजित एक विशेष समारोह में इसका उद्घाटन किया। अकादेमी के उद्घाटन के मौके पर अपने संबोधन में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कहा:

"संगीत, नाटक और नृत्य, भारत की ऐसी बहुमूल्य विरासत है जिसकी हमें क़द्र करनी चाहिए और इसका विकास करना चाहिए । हमें ऐसा सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि मानवजाति की सांस्कृतिक विरासत के प्रति योगदान के रूप में करना चाहिए । बने रहने का मतलब नया बनाना है - यह कला के क्षेत्र में जितना सच है उतना और कहीं नहीं | परम्पराओं का संरक्षण नहीं किया जा सकता है बल्कि नयी परम्पराएं बनाई जा सकती है | इस अकादेमी का यह लक्ष्य होगा की हमारी परम्पराओं का सरंक्षण करें और इसके लिए इन्हें संस्थागत रूप दिया जाए... लोकतांत्रिक व्यवस्था में, कला अपनी निरंतरता सिर्फ जनता और सरकार से प्राप्त कर सकती है, इसलिए जनता की इच्छा संगठित रूप में अवश्य अभिव्यक्त होनी चाहिए | इसलिए......... (कला का) रख-रखाव और विकास (इसकी) पहली ज़िम्मेदारियों में से एक होना चाहिए |"

अकादेमी के क्रिया कलापों का विस्तार मूल सोच के आधार पर 1961 में किया गया जब संगीत नाटक अकादेमी का सरकार द्वारा एक सोसाइटी के रूप में पुनर्गठन किया गया और इसका पंजीकरण सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1860 (जैसा 1957 में संशोधित किया गया था) के तहत किया गया। इन क्रिया कलापों का उल्लेख अकादेमी के ज्ञापन पत्र में किया गया है। इसे 11 सितम्बर 1961 को इसके पंजीकरण को सोसाइटी के रूप में अपनाया गया।

अपनी स्थापना के बाद से ही अकादेमी ने देश में कला प्रदर्शन के शीर्ष निकाय के रूप में कार्य करने के साथ-साथ, संगीत, नृत्य और नाटक के द्वारा भारत की विविध संस्कृति और विरासत को व्यक्त करने, सरंक्षित रखने और बढ़ावा देने का कार्य किया है। अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए अकादेमी भारत के विभिन्न राज्यों और प्रांतों की कला अकादेमियों के साथ मिलकर काम करने के अलावा देश के प्रमुख सांस्कृतिक संस्थानों को भी सहयोग करती है। अकादेमी को कला प्रदर्शन के क्षेत्र में संस्थाओं और राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं की देख रेख के लिए स्थापित किया गया है। अकादेमी ने 1959 में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा की स्थापना की थी। इसकी दो प्रमुख राष्ट्रीय संस्थाओं, जवाहर लाल नेहरु मणिपुर डांस एकेडमी, इम्फाल और कथक केंद्र (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कथक डांस), नई दिल्ली की स्थापना क्रमश: 1964 में हुई थी। राष्ट्रीय परियोजनाओं को समर्थन देने के लिए केरल के प्राचीन संस्कृत थियेटर कूटियट्टम, पूर्वी भारत के छऊ नृत्य और असम के सत्रिय नृत्य को बढ़ावा दिया गया। कूटियट्टम परियोजना के तहत दस वर्षों के निरंतर कार्य के बाद यूनेस्को ने मई 2001 में मानवता के मौखिक और अमूर्त विरासत के रुप में कूटियट्टम को एक उत्कृष्ट कलाकृति घोषित किया। अकादेमी संगीत, नृत्य और थिएटर को संचालित करती है। प्रख्यात कलाकारों को दिया जाने वाला अकादेमी अवॉर्ड देश का सर्वोच्च सम्मान है। अकादेमी फेलोशिप और छात्रवृत्ति भी देती है लेकिन यह संख्या 30 कालाकारों तक ही सीमित है। फेलोशिप के साथ ही अकादेमी द्वारा दिए गए पुरस्कार में 3,00,000 और 1,00,000 रुपए की राशि के अलावा एक शॉल और ताम्रपत्र दिया जाता है।

अकादेमी शिक्षण, प्रदर्शन, संगीत, नृत्य और थियेटर के प्रदर्शन तथा उसके प्रचार-प्रसार में जुटी संस्थाओं के कामों को आर्थिक सहायता देती है, प्रदर्शन कला से सम्बंधित अनुसंधान, प्रलेखन और प्रकाशन के लिए अनुदान देती है, विशिष्ट विषयों के सेमिनार और कॉंफ्रेंस का आयोजन करती है, इसके लिए आर्थिक सहायता देती है तथा अपने ऑडियो विडियो अभिलेखागार के लिए प्रलेखन और रिकार्डिंग का काम भी करती है। अकादेमी के अभिलेखागार में वृहद् स्तर पर ऑडियो-विडियो टेप्स, फोटोग्राफ्स एवं फिल्में हैं जिनका उपयोग कलाकार अनुसंधान कार्य के लिए करते हैं। अकादेमी में एक सन्दर्भ पुस्तकालय है जिसमे अंग्रेजी, हिंदी तथा कुछ क्षेत्रीयों भाषाओं की पुस्तकें हैं। अकादेमी के रवीन्द्र भवन में एक संगीत वाद्यों की गैलरी है जिसमें ढाई सौ से अधिक संगीत वाद्य हैं। अकादेमी प्रासंगिक विषयों पर साहित्य का भी प्रकाशन करती है। अकादेमी की एक प्रलेखन इकाई है, जिसमें संगीत नृत्य एवं नाटक के विद्वान् गुरुओं का संग्रहण है। इनके ऑडियो और वीडियो के माध्यम से संगीत उपकरण और साहित्य के क्षेत्र मे प्रासंगिक विषयों पर शोध करने वाले विद्यार्थियों को सहायता मिलती है। विशेषज्ञता के साथ अकादेमी प्रदर्शन कला के क्षेत्र में देश की सर्वोच्च संस्था है। अकादेमी कई क्षेत्रों में नीतियों और कार्यक्रमों का लागू करने में भारत सरकार को मदद और सलाह देती है। इसके अतिरिक्त अकादेमी भारत के विभिन्न क्षेत्रों और भारत और अन्य देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देने का काम करती है।

संगीत नाटक अकादेमी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तहत एक स्वायत संस्था है और इसे सरकार द्वारा अपनी योजनाओं व कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए वित्तीय मदद दी जाती है।

लक्ष्य एंव उद्देश्य
• प्रादेशिक या राज्य की संगीत, नृत्य और नाटक अकादमियों के कार्यकलापों का समनव्य करना।
• भारतीय संगीत, नृत्य तथा नाटक के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देना तथा इस प्रायोजन के लिए पुस्तकालयों एवं संग्रहालय आदि की स्थापना करना।
• अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए तथा समग्र रूप से भारतीय संस्कृति के संवर्धन के लिए ऐसी ही अकादमियों और अन्य संस्थाओं और संघों के साथ सहयोग करना।
• संगीत, नृत्य और नाट्य कलाओं के सम्बन्ध में विभिन्न प्रदेशों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना तथा तकनीकों का संवर्धन करना।
• प्रादेशिक भाषाओं के आधार पर नाट्य केन्द्रों की स्थापना तथा विभिन्न नाट्य केन्द्रों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना।
• नाट्य प्रस्तुति, मंच शिल्प के अध्ययन एवं अभिनव प्रशिक्षण सहित नाट्य कला में प्रशिक्षण देने वाली संस्थाओं की स्थापना को प्रोत्साहित करना।
• पुरस्कार और सम्मान प्रदान करके नए नाटकों की प्रस्तुति को प्रोत्साहन और सहयोग देना।
• सन्दर्भ ग्रंथों, यथा सचित्र शब्द, कोष पारिभाषिक शब्दावली या तकनीकी शब्दावली की पुस्तिका सहित भारतीय संगीत, नृत्य एवं नाटक सम्बन्धी साहित्य को प्रकाशित करना।
• श्रेष्ठ नाट्य संस्थाओं को मान्यता प्रदान करना या उन्हें अन्यथा सहायता प्रदान करना।
• विभिन्न नाट्य शैलियों में लिप्त दलों की गतिविधियों, बाल रंगमंच, खुले रंगमंच तथा ग्रामीण रंगमंच के विभिन्न रूपों के विकास को प्रोत्साहित करना।
• देश के विभिन्न क्षेत्रों में लोक संगीत, लोक नृत्य और लोक नाट्य को पुनर्जीवित करना, तथा उनका परिरक्षण करना और सामुदायिक संगीत तथा अन्य प्रकार के संगीत के विकास को बढ़ावा देना।
• अखिल भारतीय स्तर पर संगीत, नृत्य और नाट्य उत्सवों, संगोष्ठियों, सम्मेलनों को प्रायोजित करना तथा ऐसे क्षेत्रीय उत्सवों को प्रोत्साहित करना।
• संगीत, नृत्य तथा नाटक के क्षेत्र में उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए प्रख्यात कलाकारों को पुरस्कार, सम्मान तथा मान्यता प्रदान करना।
• संगीत, नृत्य और नाटक के शिक्षण में समुचित एवं यथेष्ट स्तर को बनाए रखने के लिए उपयुक्त कदम उठाना और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयुक्त विषयों के शिक्षण में अनुसंधान की व्यवस्था करना।
•संगीत, नृत्य तथा नाटक के क्षेत्रों में देश के विभिन्न प्रदेशों के बीच तथा अन्य देशों के साथ भी सांस्कृतिक संपर्क बढ़ाना।